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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

ग़ज़ल

कल यानी ९ अक्तूबर को  इस ब्लॉग की दूसरी सालगिरह के मौक़े  पर एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है 


".........रोई ख़ाक ए मक़तल क्यों "
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हवा भी गर्म है छाए हैं सुर्ख़ बादल क्यों?
ये ज़ुल्म किस पे हुआ ?रोई ख़ाक ए मक़तल क्यों?

जो ख़्वाब देखता आया हूं अपने बचपन से
अधूरा ख़्वाब वो होता नहीं मुकम्मल क्यों ?

हैं आज कैसी ये बेचैनियां फ़ज़ाओं में
दिल ओ दिमाग़ हुए जा रहे हैं बोझल क्यों?

जो आरज़ू थी कि हों इर्द गिर्द गुल बूटे
तो तुम ने नागफनी के उगाए जंगल क्यों ?

हम अपने शौक़ की दुनिया में गुम थे कुछ ऐसे
समझ न पाए कि भीगा है माँ का आँचल क्यों 

सुकूत से भी समंदर के ख़ौफ़ आता है 
हैं क्यों ख़मोश ये मौजें ? नहीं है हलचल क्यों?

मैं जब सुकून की मंज़िल से चंद गाम पे हूं
सदाएँ देता है माज़ी मेरा मुसलसल क्यों ?

वो कौन अपना ’शेफ़ा’ याद आ गया तुम को 
तुम्हारी आँख हुई जा रही है जलथल क्यों ?

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ख़ाक = मिट्टी ; मक़तल = रणभूमि ; मुकम्मल = पूरा ; आरज़ू = इच्छा 
सुकूत = ख़ामोशी ; गाम = क़दम ; माज़ी = अतीत ; मुसलसल = लगातार